उर्दू शायरी · ग़ज़ल

junun-e-ishq ye kya rang-e-mahfil hai jahan main hun

जुनून-ए-इश्क़ ये क्या रंग-ए-महफ़िल है जहाँ मैं हूँ

جنون عشق یہ کیا رنگ محفل ہے جہاں میں ہوں

शायर: Kaif Moradaabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुनून-ए-इश्क़ ये क्या रंग-ए-महफ़िल है जहाँ मैं हूँ
जो आलम है मिरा ही आलम-ए-दिल है जहाँ मैं हूँ

यहाँ तक कार-फ़रमा जज़्ब-ए-कामिल है जहाँ मैं हूँ
कि फ़र्क़-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन भी मुश्किल है जहाँ मैं हूँ

सिवा-ए-हुस्न कोई भी नहीं है मक़्सद-ए-हस्ती
सिवा-ए-इश्क़ हर एहसास-ए-बातिल है जहाँ मैं हूँ

जुनून-ए-ग़म का शिकवा किस से कीजे किस तरह कीजे
तजल्ली ख़ुद शरीक-ए-आलम-ए-दिल है जहाँ मैं हूँ

कुछ ऐसी बे-नियाज़ी सी तलाश-ए-चारागर से है
यहाँ हर रंज गोया राहत-ए-दिल है जहाँ मैं हूँ

मुझे तूफ़ान तो उठते हुए महसूस होते हैं
ब-ज़ाहिर कोई दरिया है न साहिल है जहाँ मैं हूँ

शुऊ'र-ए-हर-हक़ीक़त मुनहसिर दीवानगी पर है
मगर दीवानगी एक कार-ए-मुश्किल है जहाँ मैं हूँ

बक़ा तर्ग़ीब देती है मुझे शौक़-ए-फ़रावाँ की
फ़ना मिनजुमला-ए-आसार-ए-मंज़िल है जहाँ मैं हूँ

लिए जाता है कोई 'कैफ़' वर्ना ये हक़ीक़त है
यहाँ तो दो क़दम चलना भी मुश्किल है जहाँ मैं हूँ