उर्दू शायरी · ग़ज़ल

joban ki garm shawl se aage na baDh saki

जोबन की गर्म शाल से आगे न बढ़ सकी

جوبن کی گرم شال سے آگے نہ بڑھ سکی

शायर: Lucky farooqi Hasrat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जोबन की गर्म शाल से आगे न बढ़ सकी
ख़्वाहिश तिरे विसाल से आगे न बढ़ सकी

मिसरे' अगरचे करते रहे ज़ह्न का तवाफ़
लेकिन ग़ज़ल ख़याल से आगे न बढ़ सकी

जब जब मुबाहिसे हुए हुस्न-ओ-जमाल पर
दुनिया तिरी मिसाल से आगे न बढ़ सकी

की कोशिशें तो लाख मगर आँसुओं की फ़ौज
कॉटन के इक रुमाल से आगे न बढ़ सकी

कुछ मैं भी कर सका न मोहब्बत का ए'तिराफ़
कुछ वो भी बोल-चाल से आगे न बढ़ सकी

हालाँकि फूल और भी गुलशन में थे मगर
तितली तुम्हारे गाल से आगे न बढ़ सकी