उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo zindagi ke har ek dhaare mein jagta hai

जो ज़िंदगी के हर एक धारे में जागता है

جو زندگی کے ہر ایک دھارے میں جاگتا ہے

शायर: Qamar Raza Shahzad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ज़िंदगी के हर एक धारे में जागता है
तिरा बदन इस चराग़-पारे में जागता है

गुरेज़ कैसे करेगा मेरे वजूद से तू
कि तेरा सूरज मिरे सितारे में जागता है

मुझे ख़बर है ख़मोश सोया हुआ ये दरिया
कहीं किसी दूसरे किनारे में जागता है

बहुत कठिन तो नहीं है सच को तलाश करना
कि ये लहू के हर इस्तिआ'रे में जागता है

वो शख़्स यूँ ही नहीं मिरे साथ चलने वाला
कहीं कोई फ़ाएदा ख़सारे में जागता है