उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo wahshaton ke safar se niDhaal ho gae hain

जो वहशतों के सफ़र से निढाल हो गए हैं

جو وحشتوں کے سفر سے نڈھال ہو گئے ہیں

शायर: Faiz Khalilabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो वहशतों के सफ़र से निढाल हो गए हैं
वो सारे लोग मिरे हम-ख़याल हो गए हैं

वो जिस गली से हमें मुस्तरद किया गया था
हम उस गली में दोबारा बहाल हो गए हैं

हमारे दस्त-ए-हुनर की रियाज़तों के तुफ़ैल
बहुत से लोग यहाँ बा-कमाल हो गए हैं

जवाब देने की जिन में सलाहियत ही नहीं
उन्हीं से लोग सरापा सवाल हो गए हैं

उसी की आज भी रहती हैं मुंतज़िर आँखें
जिसे जुदा हुए पच्चीस साल हो गए हैं

मोहब्बतों की लुग़त के वो लफ़्ज़ हैं हम लोग
जो नफ़रतों के लिए इक वबाल हो गए हैं