उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo raste se bhi guzren unhen habib rakhun

जो रास्ते से भी गुज़रें उन्हें हबीब रखूँ

جو راستے سے بھی گزریں انہیں حبیب رکھوں

शायर: Qaisarul Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो रास्ते से भी गुज़रें उन्हें हबीब रखूँ
दिया जलाऊँ तो दहलीज़ के क़रीब रखूँ

मिरा ख़ुलूस पशेमाँ है मेरी फ़ितरत से
वो मुझ से दूर खिंचें मैं उन्हें क़रीब रखूँ

किसी के दिल में जगह हो तो बोझ बाँटूँ भी
कहीं ज़मीन नहीं है कहाँ सलीब रखूँ

कभी मिज़ाज न पूछूँ कभी लगाऊँ गले
मैं ज़िंदगी से मरासिम बड़े अजीब रखूँ

बदन से लौ तो उठे रौशनी तो हो 'क़ैसर'
हवा के रुख़ पे सुलगता हुआ नसीब रखूँ