उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo nahin hai usi khule dar ko

जो नहीं है उसी खुले दर को

جو نہیں ہے اسی کھلے در کو

शायर: Om Prabhakar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो नहीं है उसी खुले दर को
जा रहा हूँ मैं छोड़ कर घर को

अपनी दहलीज़ से मैं ता-मंज़िल
ढूँढता ही रहा हूँ रहबर को

क्या करूँ जा के क़ब्र में लेटूँ
कैसे भूलूँ मैं मौत के डर को

तू भी आता है साथ-साथ कि जब
याद करता हूँ अपने दिलबर को

जा रही है ख़िज़ाँ बग़ीचे से
छोड़ कर दामन-ए-मोअ'त्तर को

याद करता है रात भर अम्बर
तीर खाए परिंद के पर को