उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo KHud apni bhi samajh mein nahin aai hui hai

जो ख़ुद अपनी भी समझ में नहीं आई हुई है

جو خود اپنی بھی سمجھ میں نہیں آئی ہوئی ہے

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो ख़ुद अपनी भी समझ में नहीं आई हुई है
हम ने दुनिया को वही बात बताई हुई है

हम गदागर नहीं बस यूँही तुम्हारे आगे
हाथ फैलाया हुआ आँख झुकाई हुई है

नज़र आने लगी है रंग-ब-रंगी दुनिया
सामने से कोई तस्वीर हटाई हुई है

दश्त-ए-दिल देख के अक्सर ये ख़याल आता है
कोई दिन हम ने भी ये ख़ाक उड़ाई हुई है

हम तो शा'इर हैं सो ये शोर है अपना लेकिन
आपने और ही इक धूम मचाई हुई है

गरचे बे-सूद है मसरूफ़ तो रखती है 'ज़फ़र'
ये मोहब्बत जो अभी उस से छुपाई हुई है