उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo dekhiye to karam ishq par zara bhi nahin

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं

جو دیکھیے تو کرم عشق پر ذرا بھی نہیں

शायर: Saba Akbarabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं
जो सोचिए कि ख़फ़ा हैं तो वो ख़फ़ा भी नहीं

वो और होंगे जिन्हें मक़दरत है नालों की
हमें तो हौसला-ए-आह-ए-ना-रसा भी नहीं

हद-ए-तलब से है आगे जुनूँ का इस्तिग़्ना
लबों पे आप से मिलने की अब दुआ भी नहीं

हुसूल हो हमें क्या मुद्दआ' मोहब्बत में
अभी सलीक़ा-ए-इज़हार-ए-मुद्दआ भी नहीं

शगुफ़्त-ए-गुल में भी ज़ख़्म-ए-जिगर की सूरत है
किसी से एक तबस्सुम का आसरा भी नहीं

ज़हे हयात तबीअ'त है ए'तिदाल पसंद
नहीं हैं रिंद अगर हम तो पारसा भी नहीं

सुना तो करते थे लेकिन 'सबा' से मिल भी लिए
भला वो हो कि न हो आदमी बुरा भी नहीं