उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jise bhi us pe hai dawa-e-jabr bakta hai

जिसे भी उस पे है दा'वा-ए-जब्र बकता है

جسے بھی اس پہ ہے دعوائے جبر بکتا ہے

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिसे भी उस पे है दा'वा-ए-जब्र बकता है
हवा है वो तो उसे कौन रोक सकता है

बस एक बार पड़ा था उस आफ़्ताब का 'अक्स
ये दिल ये संग-ए-सियह रात भर चमकता है

ये इत्तिफ़ाक़ नहीं है जो रंग-ए-ज़र्द उस का
कभी कभी मिरे चेहरे पे भी झलकता है

कहीं छुपाए भी छुपती नहीं ख़ुशी उस की
ग़म उस की गोद में बच्चा सा जब हुमकता है

नहीं है सब्र की गुंजाइश इस क़दर दिल में
मगर अभी ये पियाला कहाँ छलकता है

मैं क़त्ल हो के भी ख़ुशबू बिखेरता हूँ 'ज़फ़र'
लहू गुलाब की सूरत पड़ा महकता है