उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ne nafrat hi mujhe di na zafar pyar diya

जिस ने नफ़रत ही मुझे दी न 'ज़फ़र' प्यार दिया

جس نے نفرت ہی مجھے دی نہ ظفرؔ پیار دیا

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस ने नफ़रत ही मुझे दी न 'ज़फ़र' प्यार दिया
मैं ने सब कुछ उसे क्यूँ हार दिया वार दिया

इक नज़र निस्फ़ नज़र शोख़ ने डाली दिल पर
और इस दश्त को पैराया-ए-गुलज़ार दिया

वक़्त ज़ाए' न करो हम नहीं ऐसे वैसे
ये इशारा तो मुझे उस ने कई बार दिया

ज़िंदा रखता था मुझे शक्ल दिखा कर अपनी
कहीं रू-पोश हुआ और मुझे मार दिया

कोई इस बात को तस्लीम करे या न करे
सुब्ह की सैर ने मुझ को दिल-ए-बीमार दिया

ज़र्दियाँ हैं मिरे चेहरे पे 'ज़फ़र' उस घर की
उस ने आख़िर मुझे रंग-ए-दर-ओ-दीवार दिया