उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ki koi tabir na ho wo KHwab dikhane aa jate hain

जिस की कोई ता'बीर न हो वो ख़्वाब दिखाने आ जाते हैं

جس کی کوئی تعبیر نہ ہو وہ خواب دکھانے آ جاتے ہیں

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस की कोई ता'बीर न हो वो ख़्वाब दिखाने आ जाते हैं
आना चाहें तो अक्सर वो किसी बहाने आ जाते हैं

आते हैं तो और ज़ियादा परेशान कर जाते हैं वो
लोग समझते हैं कि हमारा जी बहलाने आ जाते हैं

रस्ता कुछ हमवार तो कुछ दुश्वार भी करते जाते हैं वो
इक दीवार गिराने तो इक नई उठाने आ जाते हैं

बहुत सँवारी सुलझी हुई ज़ुल्फ़ों वाले दर-अस्ल हमारी
उलझी हुई तबी'अत को कुछ और उलझाने आ जाते हैं

अपने आप को ख़ुश रखने की करते रहते हैं कोशिश भी
सोचते सोचते दिल में ख़ौफ़ भी नए पुराने आ जाते हैं

यूँ है 'ज़फ़र' अहबाब की महफ़िल में अपना ये आना-जाना
जो मौज़ूँ ही नहीं हुए वो शे'र सुनाने आ जाते हैं