उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jawani ki umangon ka yahi anjam hai shayad

जवानी की उमंगों का यही अंजाम है शायद

جوانی کی امنگوں کا یہی انجام ہے شاید

शायर: Jafar Abbas Safvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जवानी की उमंगों का यही अंजाम है शायद
चले आओ कि वा'दे की सुहानी शाम है शायद

जो तिश्ना था कभी साक़ी वो तिश्ना-काम है शायद
उसी बाइ'स तो नज़्म-ए-मय-कदा बदनाम है शायद

हँसी के साथ भी आँसू निकल आते हैं आँखों से
ख़ुशी तो मेरी क़िस्मत में बराए-नाम है शायद

जिसे मय-ख़्वार पी के मय-कदे में रक़्स करते हैं
तिरी आँखों की मस्ती साक़ी-ए-गुलफ़ाम है शायद

उड़ाई शम्अ' ने जब ख़ाक-ए-परवाना तो मैं समझा
मोहब्बत करने वालों का यही अंजाम है शायद

जो अब तक मय-कशों के पास मुद्दत से नहीं आई
अभी गर्दिश में ख़ुद ही गर्दिश-ए-अय्याम है शायद

मैं दानिस्ता अब उन के सामने ख़ामोश हूँ 'जाफ़र'
ख़मोशी भी मिरी अब मोरिद-ए-इल्ज़ाम है शायद