उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jalwe hon ru-ba-ru to tamasha kare koi

जल्वे हों रू-ब-रू तो तमाशा करे कोई

جلوے ہوں روبرو تو تماشا کرے کوئی

शायर: Kaif Moradaabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जल्वे हों रू-ब-रू तो तमाशा करे कोई
जब कुछ नज़र न आए तो फिर क्या करे कोई

हुस्न-ए-लतीफ़ क्यों हो असीर-ए-निगाह-ए-शौक़
हम ख़ुद ये चाहते हैं कि पर्दा करे कोई

सदहा हिजाब-हा-ए-तअ'य्युन के बावजूद
वो क्या करें जो उन की तमन्ना करे कोई

थर्रा के रह गई है मिरी काएनात-ए-होश
ऐसे भी सामने से न गुज़रा करे कोई

किस किस से राह-ए-दोस्त में दामन छुड़ाइए
हर ज़र्रा चाहता है कि सज्दा करे कोई

हर क़ल्ब मुज़्तरिब है मगर उन की मस्लहत
दुनिया ख़राब-ए-ग़म है मगर क्या करे कोई

मेरी निगाह-ए-शौक़ से इस बज़्म-ए-नाज़ में
वो हुस्न आ रहा है कि देखा करे कोई

दिल आश्ना-ए-ग़म हो तो ऐ 'कैफ़' बज़्म-ए-दहर
ऐसा निगार-ख़ाना है देखा करे कोई