उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jald o mah tu ghar se nikla

जल्द ओ माह तू घर से निकला

جلد و ماہ تو گھر سے نکلا

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जल्द ओ माह तू घर से निकला
शुक्र है चाँद किधर से निकला

सामना छोड़ ना देना ख़ुर्शीद
ख़ंजर उस मह की कमर से निकला

तेरा 'आशिक़ तो न था ओ लैला
कोई मजनूँ सा उधर से निकला

मिस्ल-ए-बू रुख़ ना किया सू-ए-चमन
फिर ना आया मैं जिधर से निकला

दिल ने फिर तुझ से लगाई हो न लौ
आह फिर शो'ला जिगर से निकला

किस की आँखों पे चढ़ा था कि ये दिल
हो के ख़ूँ दीदा-ए-तर से निकला

ज़ुल्फ़ तक हाथ तो पहुँचा बारे
सिलसिला मू-ए-कमर से निकला

सैर गुल-रूयों की करता होगा
है 'नसीम' आज सहर से निकला