उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaise-taise rah jata hai

जैसे-तैसे रह जाता है

جیسے تیسے رہ جاتا ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जैसे-तैसे रह जाता है
सब कुछ ऐसे रह जाता है

लाश उभर आती है ऊपर
पानी नीचे रह जाता है

मैं ही निकल जाता हूँ आगे
क़ारी पीछे रह जाता है

काम जो वक़्त पे किया न जाए
रहते रहते रह जाता है

रहने पर आ जाए तो वो
किसी बहाने रह जाता है

सोचे-समझे वो न रहे तो
भूले-भटके रह जाता है

तेज़ बहुत चलने वाला भी
आधे रस्ते रह जाता है

बात वो क्या है जिसे 'ज़फ़र' तू
कहते कहते रह जाता है