उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaise kitab mein sukhe phul ki ek mahak rah jati hai

जैसे किताब में सूखे फूल की एक महक रह जाती है

جیسے کتاب میں سوکھے پھول کی ایک مہک رہ جاتی ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जैसे किताब में सूखे फूल की एक महक रह जाती है
ख़त्म भी हो जाए जो मोहब्बत कोई कसक रह जाती है

आँसुओं के थमते ही उस के रंग बिखरते हैं दिल पर
अब्र बरस कर खुल जाता है और धनक रह जाती है

इधर उधर की राहें सारी नापता रहता हूँ लेकिन
ख़्वाब के अन्दर जाने वाली कोई सड़क रह जाती है

वो तो एक एहसास है उस को जैसा भी महसूस करो
दिल से हाथ उठा भी ले फिर भी ठंडक रह जाती है

जब भी गुज़र जाता है वो बिजली सी गिराते हुए कभी
दिल में धुआँ भर जाता है आँखों में चमक रह जाती है

एक परेशानी होती है उस के आने से पहले
और कोई उलझन सी उस के जाने तक रह जाती है

सभी तकल्लुफ़ उठ जाते हैं बज़्म-ए-ख़याल में उस के साथ
फिर भी कहीं रुकना पड़ता है कहीं झिझक रह जाती है

दिल में दाख़िल हो जाती है रफ़्ता रफ़्ता शाम 'ज़फ़र'
आसमान पर जितनी देर के लिए शफ़क़ रह जाती है