उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan main hun wahan haalat ka manzar nahin badla

जहाँ मैं हूँ वहाँ हालात का मंज़र नहीं बदला

جہاں میں ہوں وہاں حالات کا منظر نہیں بدلا

शायर: G R Kanwal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहाँ मैं हूँ वहाँ हालात का मंज़र नहीं बदला
वही हैं चाँद तारे रात का मंज़र नहीं बदला

उसी अंदाज़ से गिरती है बिजली आशियाने पर
हवा गुस्ताख़ है बरसात का मंज़र नहीं बदला

अगर बदला है कुछ कुछ जिस्म-ओ-जाँ का रूप बाहर से
वही है रूह मेरी ज़ात का मंज़र नहीं बदला

हज़ारों लोग अब भी हाथ फैलाए हैं सड़कों पर
हमारे शहर में ख़ैरात का मंज़र नहीं बदला

'कँवल' इक मेहरबाँ ने दी थी जो मुझ को मोहब्बत में
ख़ुदा का शुक्र उस सौग़ात का मंज़र नहीं बदला