उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan lamha-e-sham bikher diya

जहाँ लम्हा-ए-शाम बिखेर दिया

جہاں لمحۂ شام بکھیر دیا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहाँ लम्हा-ए-शाम बिखेर दिया
वहीं इक पैग़ाम बिखेर दिया

ख़ुद उस के क़दमों में अपना
सब पुख़्ता-ओ-ख़ाम बिखेर दिया

चालाक परिंदा था वो भी
हम ने भी दाम बिखेर दिया

जितनी तकलीफ़ इकट्ठा की
उतना आराम बिखेर दिया

दरवाज़ा खोला जल्दी से
और सारा काम बिखेर दिया