उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jahan dhuan tha wahin raushni ke dagh bhi the

जहाँ धुआँ था वहीं रौशनी के दाग़ भी थे

جہاں دھواں تھا وہیں روشنی کے داغ بھی تھے

शायर: Qaisarul Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जहाँ धुआँ था वहीं रौशनी के दाग़ भी थे
मिरे मकान के मलबे में कुछ चराग़ भी थे

ज़रा सी देर में महफ़िल को क्या हुआ या-रब
अभी तो शाम भी थी मय भी थी अयाग़ भी थे

ज़मीन बेच के रहते थे आसमानों पर
मिरे बुज़ुर्गों में वो साहिब-ए-फ़राग़ भी थे

ख़ुदा भी देख के चुप था कि मेरे दामन में
जहाँ गुनाह वहीं आँसुओं के दाग़ भी थे

जो हम जले तो दिल-ओ-जाँ चमक उठे 'क़ैसर'
बहुत दिनों से ये वीराने बे-चराग़ भी थे