उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jabin pe is dar ka paira bhi hai kamar pe is ghar ka bar bhi hai

जबीं पे इस दर का पैरा भी है कमर पे इस घर का बार भी है

جبیں پہ اس در کا پیرا بھی ہے کمر پہ اس گھر کا بار بھی ہے

शायर: Ijtiba Rizvi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जबीं पे इस दर का पैरा भी है कमर पे इस घर का बार भी है
इधर के चुकते नहीं तक़ाज़े उधर से पैहम पुकार भी है

उजाड़ हो भी चुका मिरा दिल मगर अभी दाग़दार भी है
यही ख़िज़ाँ थी बहार-ए-दुश्मन जो यादगार-ए-बहार भी है

चढ़ा के पी थी मय-ए-जवानी ग़ज़ब था शीरीं वो शोर पानी
उसी का दो दिन सुरूर भी था उसी का अब तक ख़ुमार भी है

ये राह-ए-दूर-ओ-दराज़ मुझ को दिखाती लाई यही तमाशा
क़दम क़दम इज्तिमा भी है नफ़स नफ़स इंतिशार भी है

हमारे उन के बस इक मोहब्बत ख़ुदाई क्या बंदगी कहाँ की
बहुत ही नाज़ुक है गो ये रिश्ता मगर यही उस्तुवार भी है

वो सोज़न-ए-फ़िक्र जिस ने इक दिन ये रख़्त-ए-तहज़ीब सी दिया था
उसी की काविश से आज देखो ये पैरहन तार तार भी है

नहीं किया शुक्र ज़िंदगी का मगर शिकायत भी की नहीं है
कि जिस क़दर नागवार है ये उसी क़दर ख़ुश-गवार भी है

नहीं फ़क़त बावली निगाहें ज़ुहूर ख़ुद है ख़िराम-ए-मस्ती
सुकून-ए-महमिल-नशीं का दुश्मन ये नाक़ा-ए-बे-महार भी है

निगार-ख़ाने में मेहर ओ मह के बहुत भयानक है नक़्श-ए-आदम
बला का सरकश अज़ल का बाग़ी मगर यही शाहकार भी है