उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab tujhe KHwab banata hun to ro deta hun

जब तुझे ख़्वाब बनाता हूँ तो रो देता हूँ

جب تجھے خواب بناتا ہوں تو رو دیتا ہوں

शायर: Maaz Muaviya7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब तुझे ख़्वाब बनाता हूँ तो रो देता हूँ
आँख पर्दों से हटाता हूँ तो रो देता हूँ

इस क़दर दिल में नमी है कि ठहरता ही नहीं
ज़ह्न पर चाँद उगाता हूँ तो रो देता हूँ

ख़ामुशी इतनी ज़ियादा है दयार-ए-दिल में
शोर के पास भी जाता हूँ तो रो देता हूँ

इस तरह मेरे लिए खिड़की खुली रहती है
इक गली छोड़ के जाता हूँ तो रो देता हूँ

इस तरह तुम भी बसी हो मिरी दानाई में
जब कभी आर्ट बनाता हूँ तो रो देता हूँ

उन क़बीलों में मोहब्बत भी नहीं उगती है
जब उसे देखने जाता हूँ तो रो देता हूँ

फिर उसी सम्त से कुछ ताज़ा हवा आती है
जिस तरफ़ दश्त को जाता हूँ तो रो देता हूँ