उर्दू शायरी · ग़ज़ल

adu ki samt se hum par jo tir mara gaya

'अदू की सम्त से हम पर जो तीर मारा गया

عدو کی سمت سے ہم پر جو تیر مارا گیا

शायर: Maaz Muaviya9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अदू की सम्त से हम पर जो तीर मारा गया
हमारे जज़्बा-ए-उल्फ़त को फिर उभारा गया

हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना खिले गुलों की तरह
जो तेरा नाम सर-ए-बज़्म यूँ पुकारा गया

वो जिस का साथ अकेला हमें न छोड़ता था
हमारी ज़ीस्त का वो ख़ुश-नुमा सहारा गया

ग़रीब शख़्स की उल्फ़त अमर हुई आख़िर
शह-ए-दयार-ए-जफ़ा तख़्त से उतारा गया

किसी को मंज़िल-ए-मक़्सूद ख़ुद बुलाती रही
किसी को राह की तारीकियों में मारा गया

हमारी माँग न जाने यहाँ पे कौन भरे
किसी के सामने दामन अगर पसारा गया

किसी को अपना बनाने की आरज़ू क्यों हो
कि डूब अपने मुक़द्दर का जब सितारा गया

ये शा'इरी तो मियाँ ख़ून-ए-दिल से फूटेगी
लहू से क़ल्ब के जज़्बों को गर सँवारा गया

रह-ए-हयात से वाबस्तगी तो है उस की
'म'आज़' लौट ही आएगा गर पुकारा गया