उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai kash mile yar ka didar musalsal

ऐ काश मिले यार का दीदार मुसलसल

اے کاش ملے یار کا دیدار مسلسل

शायर: Maaz Muaviya6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ काश मिले यार का दीदार मुसलसल
मैं जिस के लिए जाता हूँ दरबार मुसलसल

मैं राह-ए-वफ़ा देखना सर कर के रहूँगा
रस्ते में खड़ी लाख हो दीवार मुसलसल

जा साहब-ए-ज़र जीत बनी तेरा मुक़द्दर
हम ऐसे ग़रीबों की हुई हार मुसलसल

फैलाए नहीं हाथ किसी फ़र्द के आगे
साबित हुए हर हाल में ख़ुद्दार मुसलसल

जब नाम हुआ मेरा तिरे नाम से मंसूब
जलने लगे सब सूरत-ए-अग़्यार मुसलसल

दुनिया है 'म’आज़' अब भी मोहब्बत से गुरेज़ाँ
लटकी रही हर दौर में तलवार मुसलसल