उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab na jite-ji mere kaam aaegi

जब न जीते-जी मिरे काम आएगी

جب نہ جیتے جی مرے کام آئے گی

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब न जीते-जी मिरे काम आएगी
क्या ये दुनिया आक़िबत बख़्शाएगी

जब मिले दो दिल मुख़िल फिर कौन है
बैठ जाओ ख़ुद हया उठ जाएगी

गर यही है इस गुलिस्ताँ की हवा
शाख़-ए-गुल इक रोज़ झोंका खाएगी

दाग़-ए-सौदा एक दिन देगा बहार
फ़स्ल इस गुल की शगूफ़ा लाएगी

कुछ तो होगा हिज्र में अंजाम-ए-कार
बे-क़रारी कुछ न कुछ ठहराएगी

संदली रंगों से माना दिल मिला
दर्द सर की किस के माथे जाएगी

ख़ाकसारों से जो रक्खेगा ग़ुबार
ओ फ़लक बदली तिरी हो जाएगी

जब करेगा गर्मियाँ वो शोला-रू
शम-ए-महफ़िल देख कर जल जाएगी

जाँ निकल जाएगी तन से ऐ 'नसीम'
गुल को बू-ए-गुल हवा बतलाएगी