उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab mai-e-lala-fam hoti hai

जब मय-ए-लाला-फ़ाम होती है

جب مئے لالہ فام ہوتی ہے

शायर: Dagh Dehlvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब मय-ए-लाला-फ़ाम होती है
मुझ को तौबा हराम होती है

ख़ूब-रू वो है जिस की ख़ू अच्छी
शम्अ' सूरत-हराम होती है

ये सुना है कि बरहमन से भी
शैख़ की राम राम होती है

तेरा वा'दा है किस क़यामत का
रात दिन सुब्ह-ओ-शाम होती है

हिज्र का दिन ढले तो हम जानें
सुब्ह के बा'द शाम होती है

पहले ऐ 'दाग़' कुछ न होश आया
दिल की अब रोक-थाम होती है