उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab hui KHak to iksir hui hai baba

जब हुई ख़ाक तो इक्सीर हुई है बाबा

جب ہوئی خاک تو اکسیر ہوئی ہے بابا

शायर: Jafar Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब हुई ख़ाक तो इक्सीर हुई है बाबा
आरज़ू मिटने से तासीर हुई है बाबा

दाग़ हैं क़ल्ब-ओ-जिगर छुट गए अरबाब-ए-वफ़ा
ज़िंदगी अब मुझे ता'ज़ीर हुई है बाबा

दर्द ही चारागर और दर्द ही दरमाँ निकला
दर्द ही दर्द की तदबीर हुई है बाबा

कोई बतला न सका तालिब-ओ-मतलूब का फ़र्क़
यूँ तरीक़त की भी ता'बीर हुई है बाबा

कर्बला धूप है तो प्यास है दरिया-ए-फ़ुरात
इक सदाक़त यूँही तहरीर हुई है बाबा

ख़ाक पर सज्दा हो क़ातिल की छुरी शह-रग पर
हर सदा ना'रा-ए-तकबीर हुई है बाबा

नोक नेज़ा पे कोई बोलता क़ुरआन भी था
इस तरह से कभी तफ़्सीर हुई है बाबा