उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab dasht-e-tamanna mein koi phul khila hai

जब दश्त-ए-तमन्ना में कोई फूल खिला है

جب دشت تمنا میں کوئی پھول کھلا ہے

शायर: Hafeez Betab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब दश्त-ए-तमन्ना में कोई फूल खिला है
शहर-ए-दिल-ए-ख़ामोश से इक शोर उठा है

आँखों में खंडर होंटों पे इक भूला हुआ नाम
चाहत में किसी की ये अजब हाल हुआ है

फिर यादों की दहलीज़ पे जल उट्ठी हैं शमएँ
फिर पलकों पे बिखरा हुआ इक ख़्वाब सजा है

हर साँस हो तलवार सी जैसे रग-ए-जाँ पर
जीना भी यहाँ नाम किसी मो'जिज़े का है

ख़ामोश बहुत देर से है बहर-ए-हवादिस
तूफ़ान तह-ए-आब कोई खौल रहा है

तुम चाहो तो ये आख़िरी सरमाया भी ले लो
इक दर्द की दौलत के सिवा पास ही क्या है

'बेताब' बरस जाने दो आँखों का ये सावन
तिनकों का बदन शो'लों की बाहों में घिरा है