उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankhen munde sab kuchh bhule kab se yunhi baiThe hain

आँखें मूँदे सब कुछ भूले कब से यूँही बैठे हैं

آنکھیں موندے سب کچھ بھولے کب سے یوں ہی بیٹھے ہیں

शायर: Hafeez Betab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँखें मूँदे सब कुछ भूले कब से यूँही बैठे हैं
पलकों पे कुछ ख़्वाब सजाए जागे जागे सोए हैं

किस से क्या रिश्ता था मेरा अब तो ये भी याद नहीं
रेज़ा-रेज़ा आईना है बिखरे बिखरे चेहरे हैं

अपने घर की वीरानी का हम किस से क्या हाल कहें
सूना सूना दरवाज़ा है ख़ाली ख़ाली कमरे हैं

तन्हाई के अँधियारे में यादों की मौहूम किरन
जैसे रात की पेशानी पर झिलमिल झिलमिल तारे हैं

तुम से क्या बतलाएँ दिल का आलम क्या हो जाता है
बीते मौसम की यादों के आँचल जब लहराते हैं

अब के बरस भी सावन आ कर यूँही बीत गया आख़िर
जलते हैं हम अंदर अंदर आस के पंछी प्यासे हैं

वक़्त की भट्टी में तप तप कर हम ने ये जाना 'बेताब'
सच्चा है इक दर्द का रिश्ता बाक़ी रिश्ते झूटे हैं