उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi raste pe ghaur karta hun

जब भी रस्ते पे ग़ौर करता हूँ

جب بھی رستے پہ غور کرتا ہوں

शायर: Aadarsh Dubey6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी रस्ते पे ग़ौर करता हूँ
पहले ख़तरे पे ग़ौर करता हूँ

टहनियों को हरा-भरा रखना
पत्ते पत्ते पे ग़ौर करता हूँ

ख़ूबसूरत तो उस के हाथ भी हैं
पर मैं चेहरे पे ग़ौर करता हूँ

उस की बोली समझ नहीं आती
सिर्फ़ लहजे पे ग़ौर करता हूँ

जब तिरे शहर से गुज़रता हूँ
चप्पे-चप्पे पे ग़ौर करता हूँ

ज़र्रे-ज़र्रे में वो दिखाई दे
ज़र्रे-ज़र्रे पे ग़ौर करता हूँ