उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jagte zaKHmon ki mahfil hai ki shab

जागते ज़ख़्मों की महफ़िल है कि शब

جاگتے زخموں کی محفل ہے کہ شب

शायर: Chandrabhan Khayal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जागते ज़ख़्मों की महफ़िल है कि शब
ये कोई टूटा हुआ दिल है कि शब

क़ब्र से बाहर निकल आई है आज
दास्तान-ए-कर्ब-अ-हासिल है कि शब

कू-ब-कू सारी फ़ज़ा ख़ामोश है
शहर पर रक्खी हुई सिल है कि शब

लम्हा लम्हा ज़हर पी कर मस्त है
फन पटकते साँप का दिल है कि शब

लाश अपनी चाटती है जीभ से
दश्त में आह-ए-क़वाफ़िल है कि शब

चीख़ते हैं लफ़्ज़ रोते हैं वरक़
ये मिरे 'ऐबों की फ़ाइल है कि शब

जिस्म के सहरा में झरने खोजती
तिश्नगी मंज़िल-ब-मंज़िल है कि शब