उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaenge us bazm mein puri hi tayyari se hum

जाएँगे उस बज़्म में पूरी ही तय्यारी से हम

جائیں گے اس بزم میں پوری ہی تیاری سے ہم

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जाएँगे उस बज़्म में पूरी ही तय्यारी से हम
यूँही बच सकते हैं शायद रोज़ की ख़्वारी से हम

दूर रहना चाहते भी हैं सितमगर से मगर
रोज़ आ जाते हैं उस के पास लाचारी से हम

दिन के भी दौरान अक्सर देखते हैं ख़्वाब से
काम लेते हैं तो बस इतना ही बेदारी से हम

इक तरफ़ लग ही गए हैं वो ग़लत हो या सहीह
रुक नहीं सकते हैं अब उस की तरफ़-दारी से हम

आज कुछ 'उजलत सी है इसरार भी है इस लिए
वर्ना पहले तो भुगत जाते ही थे बारी से हम

ख़ुद भी होता जा रहा है उस तरफ़ अपना झुकाव
कुछ दिनों से तंग भी हैं अपनी बेज़ारी से हम

देखते हैं हर तरफ़ क्या क्या नदीदों की तरह
ताज़ा ताज़ा आज कल उट्ठे हैं बीमारी से हम

माल सारा ही बहुत नाक़िस निकल आया 'ज़फ़र'
बाज़ आ सकते अगर ऐसी ख़रीदारी से हम