उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq taron se na mahtab se dildari ki

'इश्क़ तारों से न महताब से दिलदारी की

عشق تاروں سے نہ مہتاب سے دل داری کی

शायर: Lucky farooqi Hasrat9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'इश्क़ तारों से न महताब से दिलदारी की
रात ने धूप के बिस्तर पे सियह-कारी की

मैं वो दहक़ान-ए-जुनूँ-ख़ेज़ हूँ जिस ने अपने
जिस्म के खेत में ज़ख़्मों की शजर-कारी की

मुद्दतों लटकी रही मोम की ज़ंजीर से लाश
बर्फ़ के सूखे हुए पेड़ पे चिंगारी की

चंद साँसों के लिए अपना मुदावा कर के
तू ने अमराज़-ए-ख़ुदा-दाद से ग़द्दारी की

कुछ तग़य्युर की ये रातें भी बहुत लम्बी हैं
कुछ मिरी क़ौम को 'आदत नहीं बेदारी की

सुई के छेद से हाथी का गुज़र मुमकिन है
इसे कहते हैं तख़य्युल की बहुत बारीकी

तुम ने लफ़्ज़ों की नुमाइश पे फ़क़त ध्यान दिया
मैं ने काग़ज़ के हसीं जिस्म पे गुल-कारी की

रूह पर इत्र लगा के मिरे पास आया कर
तेरे किरदार से बू आती है मक्कारी की

बज़्म-ए-दानिश में न मुँह खोलना अपना 'हसरत'
तुझ से उम्मीद नहीं मुझ को समझदारी की