उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq mein roe hain itna shab-e-tanhai mein hum

'इश्क़ में रोए हैं इतना शब-ए-तन्हाई में हम

عشق میں روئے ہیں اتنا شب تنہائی میں ہم

शायर: Kabeer Halati7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'इश्क़ में रोए हैं इतना शब-ए-तन्हाई में हम
अब तो भाते नहीं बरसात के हम को मौसम

ख़ुश्क लहजे में न कर बात मिरी जाँ मुझ से
धूप पी जाती है फूलों के लबों से शबनम

एक इक ज़ख़्म हरा है मिरा सुनते ये थे
वक़्त भर देता है हर ज़ख़्म को बन के मरहम

जान से अपनी चले जाते हैं कितने कीड़े
तब कहीं बनता है पोशाक की ख़ातिर रेशम

बैठना पड़ता है बरसों किसी पीपल के तले
बुद्ध तब जा के कहीं बनता है कोई गौतम

उठने लगते हैं कई दर्द मिरे सीने में
ज़िंदगी देखता हूँ जब भी तिरा मैं एल्बम

यूँ ही ग़ज़लों में नहीं आई कबीरा ये तड़प
अपने माज़ी से लड़ा हूँ मैं अकेला हर दम