उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is se pahle ki naya phir koi hamla ho jae

इस से पहले कि नया फिर कोई हमला हो जाए

اس سے پہلے کہ نیا پھر کوئی حملہ ہو جائے

शायर: Zafar Zaidi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस से पहले कि नया फिर कोई हमला हो जाए
जागते रहिए यहाँ तक कि सवेरा हो जाए

ख़ुद को हर सम्त से पानी में घिरा पाता हूँ
मुझ पे अल्लाह करे प्यास का ग़लबा हो जाए

जिस्म में जिस्म छुपा लीजे कि उस से पहले
ठण्ड बढ़ जाए हवा का कोई हमला हो जाए

कब से वो संग लिए फिरता है बेचैन उदास
आज ऐ काश मिरा जिस्म भी शीशा हो जाए

रोज़ हर चेहरा नया हर नई पोशाक के साथ
कैसे हर कोई 'ज़फ़र' आप के जैसा हो जाए