उर्दू शायरी · ग़ज़ल

intihai bhiD mein ek ibtida hai aaKHiri

इंतिहाई भीड़ में इक इब्तिदा है आख़िरी

انتہائی بھیڑ میں اک ابتدا ہے آخری

शायर: Parwez Rahmani5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इंतिहाई भीड़ में इक इब्तिदा है आख़िरी
फिर न होगा बाद में ये सानेहा है आख़िरी

अपना अपना चेहरा ले कर आ गए हैं सब के सब
वक़्त के हाथों में जबकि आइना है आख़िरी

देखिए बनता है कौन उस की मलामत का हदफ़
तीर उस ज़ालिम के तरकश में बचा है आख़िरी

एक मुट्ठी आसमाँ बस एक मुट्ठी आसमाँ
उस परिंदे की यही बस इल्तिजा है आख़िरी

आख़िरी बार आओ आँखें भर लें 'रहमानी' से हम
फिर कहाँ कि रौशनी का सिलसिला है आख़िरी