उर्दू शायरी · ग़ज़ल

imkanon se aage mere dosh paDi hain

इमकानों से आगे मेरे दोश पड़ी हैं

امکانوں سے آگے میرے دوش پڑی ہیں

शायर: Parwez Rahmani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इमकानों से आगे मेरे दोश पड़ी हैं
जानी-पहचानी आवाज़ें गोश पड़ी हैं

तब से हूँ किस सन्नाटे में क्या बतलाऊँ
कुछ पहचानें जब से मेरे होश पड़ी हैं

तारीकी क्या ज़ाहिर कर पाएगी उन को
रौशनियों में जो शक्लें रू-पोश पड़ी हैं

ख़्वाब अज्दाद के बेटों का रस्ता तकते हैं
दौर-ए-फ़लक पर ता'बीरें ख़ामोश पड़ी हैं

नुतफ़े जो बाज़ार से आए हैं किस के हैं
ये बातें अब तक न किसी के होश पड़ी हैं

मुस्तक़बिल हद-दर्जा ख़ुश-आइंदे हुआ है
पिछली क़द्रों से नस्लें बे-गोश पड़ी हैं

पुश्तों पर सन्नाटा तारी होने को है
औलादें हम-जिंसी में मदहोश पड़ी हैं

सुस्त-ख़िरामों ने फिर से मंज़िल मारी है
रफ़तीज़ों की नींदें फिर ख़रगोश पड़ी हैं