उर्दू शायरी · ग़ज़ल

idhar udhar na sabhi se muzakaraat kare

इधर उधर न सभी से मुज़ाकरात करे

ادھر ادھر نہ سبھی سے مذاکرات کرے

शायर: Yasir Abul Aas6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इधर उधर न सभी से मुज़ाकरात करे
जिसे गिला हो कोई आ के हम से बात करे

ज़रूरियात की तकमील सब से पहले है
फिर उस के बा'द कोई शख़्स ख़्वाहिशात करे

ग़रीब ‘अद्ल-ओ-मुसावात चीख़ता ही रहे
अमीर-ए-शहर ग़रीबों से ज़ात-पात करे

बिला-झिजक वो मुकम्मल सुना दे हाल-ए-दिल
उसे कहो कि न बेजा तकल्लुफ़ात करे

ये ज़िंदगी तो फ़क़त हादसों में गुज़री है
बयान क्या कोई तफ़्सील-ए-हादसात करे

'अता हो ऐसा कोई हम-नफ़स कि जो 'यासिर'
हमारे साथ वफ़ा ता-दम-ए-हयात करे