उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil ke tah-KHane mein ek harf-e-dua rakhta hun

दिल के तह-ख़ाने में इक हर्फ़-ए-दु'आ रखता हूँ

دل کے تہہ خانے میں اک حرف دعا رکھتا ہوں

शायर: Yasir Abul Aas8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल के तह-ख़ाने में इक हर्फ़-ए-दु'आ रखता हूँ
अपनी ख़्वाहिश का गिला ऐसे दबा रखता हूँ

मेरे किरदार पे उँगली जो उठाते हैं सुनो
मैं हूँ जैसा भी मगर पास-ए-वफ़ा रखता हूँ

ऐसे अल्फ़ाज़ न मिल पाए बयाँ हों जिस से
अपने जज़्बात जो सीने में छुपा रखता हूँ

ये भी ख़्वाहिश है कि कुछ लोग मुख़ालिफ़ हों मिरे
वर्ना अहबाब तो मैं बेश-बहा रखता हूँ

ज़ीस्त के जितने मराहिल हैं सभी आसाँ हों
गर मिटा दूँ मैं ये जो ख़्वाब सजा रखता हूँ

जाने क्यों देख के छुपता है वो मुझ से यकसर
एक मैं हूँ कि फ़क़त शौक़-ए-लिक़ा रखता हूँ

मुझ से शाहों को सलामी की तवक़्क़ो' मत रख
क्यूँकि मैं दिल में फ़क़त ख़ौफ़-ए-ख़ुदा रखता हूँ

हर जगह ज़ख़्म का मरहम नहीं मिलता ऐ दोस्त
आ मिरे पास कि मैं ख़ाक-ए-शिफ़ा रखता हूँ