उर्दू शायरी · ग़ज़ल

husn be-parda hai jalwa aam hai

हुस्न बे-पर्दा है जल्वा आम है

حسن بے پردہ ہے جلوہ عام ہے

शायर: Panna Lal Noor6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुस्न बे-पर्दा है जल्वा आम है
देखना अहल-ए-नज़र का काम है

कुछ नहीं होता ब-जुज़ हुक्म-ए-ख़ुदा
आदमी तो मुफ़्त में बदनाम है

अब ख़ुदा बख़्शे न बख़्शे क्या करूँ
दिल तो मेरा बंदा-ए-असनाम है

देखिए चलिए नज़ारे राह के
ये सफ़र बस और दो इक गाम है

हम-नशीनो अब तो मेरे वास्ते
ज़िंदगी टूटा हुआ इक जाम है

दर्द भी कुछ दब गया है दिल के साथ
'नूर' इस करवट बहुत आराम है