उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hui jab shama raushan bazm mein parwane jag uTThe

हुई जब शम्अ रौशन बज़्म में परवाने जाग उट्ठे

ہوئی جب شمع روشن بزم میں پروانے جاگ اٹھے

शायर: Chandra Parkash Jauhar Bijnauri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुई जब शम्अ रौशन बज़्म में परवाने जाग उट्ठे
जुनूँ ने इस तरह अंगड़ाई ली दीवाने जाग उट्ठे

ब-फ़ैज़-ए-चश्म-ए-साक़ी बज़्म में पैमाने जाग उट्ठे
इधर गर्दिश में जाम आए इधर मयख़ाने जाग उट्ठे

ये किस जान-ए-बहाराँ ने ब-अंदाज़-ए-करम देखा
मुक़द्दर खुल गए सहराओं के वीराने जाग उट्ठे

ख़ुदा मालूम क्या तासीर थी रिंदों की आमद में
क़दम रक्खा इधर और उस तरफ़ मयख़ाने जाग उट्ठे

किसी को तो नवा-ए-दर्द सुन कर जागना ही था
अगर अपने नहीं जागे तो क्या बेगाने जाग उट्ठे

मोअज़्ज़िन की सदा-ए-दिल-नशीं का ये असर देखा
हरम वालों की आँखें खुल गईं बुत-ख़ाने जाग उट्ठे

ये किस ने ज़िक्र छेड़ा उस सरापा-नाज़ का 'जौहर'
कि हुस्न-ओ-इश्क़ के सोए हुए अफ़्साने जाग उट्ठे