उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hosh-o-KHirad mein aag laga di KHirman-e-kaif-o-kam ko jalaya

होश-ओ-ख़िरद में आग लगा दी ख़िरमन-ए-कैफ़-ओ-कम को जलाया

ہوش و خرد میں آگ لگا دی خرمن کیف و کم کو جلایا

शायर: Ijtiba Rizvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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होश-ओ-ख़िरद में आग लगा दी ख़िरमन-ए-कैफ़-ओ-कम को जलाया
शो'ला बने और सीने से लिपटे आप जले और हम को जलाया

जिस को कहें घर फूँक तमाशा बस वो तमाशा आप ने देखा
आप की बिजली ख़ुश है कि उस ने मुश्त-ए-ख़स-ए-आदम को जलाया

ग़ैर को झिड़की हम पे इनायत हो गई आख़िर जान को आफ़त
बज़्म-ए-अज़ल में तुम ने बुला कर किस लिए ना-महरम को जलाया

ज़िंदगी अपनी यास-ओ-तमन्ना आग पे आग और शो'ले पे शो'ला
दिल को हमारे ग़म से जला कर शो'ला-रूख़ से ग़म को जलाया

कैसी जलन थी कैसी जलन है जल चुके फिर भी जल न चुकते
काश कोई यूँ तुम को जलाए जैसे कि तुम ने हम को जलाया

आग है बिजली आग हैं ज़र्रे आग है सूरज आग हैं तारे
हम ने न की थी शोख़-निगाही आप ने क्यों आलम को जलाया