उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hone ko to KHilqat mein teri honge jahan aur

होने को तो ख़िल्क़त में तिरी होंगे जहाँ और

ہونے کو تو خلقت میں تری ہوں گے جہاں اور

शायर: Panna Lal Noor5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

होने को तो ख़िल्क़त में तिरी होंगे जहाँ और
पर तेरा ये दर छोड़ के जाऊँ मैं कहाँ और

ये दैर से बद-ज़न वो गुरेज़ाँ है हरम से
जैसे कि हक़ीक़त हो यहाँ और वहाँ और

रह जाए न फिर शिकवा-ए-बेदाद का इम्काँ
सीना जो हुआ चाक तो कट जाए ज़ियाँ और

हम कौन हैं क्या हैं ये नहीं जानते ख़ुद भी
हम सा भी कोई होगा भला हेच-मदाँ और

तक़लीद तबीअ'त को गवारा नहीं ऐ 'नूर'
चलता हूँ बनाता हुआ ख़ुद अपने निशाँ और