उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ho gaya hal zindagi ka masala jo mujh mein tha

हो गया हल ज़िंदगी का मसअला जो मुझ में था

ہو گیا حل زندگی کا مسئلہ جو مجھ میں تھا

शायर: P P Srivastava Rind8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हो गया हल ज़िंदगी का मसअला जो मुझ में था
ख़ामुशी से इक परिंदा उड़ गया जो मुझ में था

‘अक्स-अंदर-‘अक्स ख़ुद तो देखता रहता था कौन
आइना-दर-आइना वो कौन था जो मुझ में था

अपने काँधे पर उठाए बे-कराँ ग़म की सलीब
चल दिया बे-सम्तियों में क़ाफ़िला जो मुझ में था

वक़्त के खे़मे से बाहर कौन आ कर देखता
मौसमों का वो सुलगता सिलसिला जो मुझ में था

जिस का साया दूर कर देता था दिन-भर की थकन
वो शजर पहले तो सूखा फिर जला जो मुझ में था

मुज़्तरिब लम्हात को तस्कीन देने के लिए
मैं ने ख़ुद ही तोड़ डाला आइना जो मुझ में था

किस ने सोचा था वही कड़वा धुआँ बन जाएगा
सब्ज़ पेड़ों का घनेरा सिलसिला जो मुझ में था

शब के सन्नाटे में सुनता था जिसे मैं सुब्ह तक
'रिंद' वो कर्ब-ए-अना का शोर था जो मुझ में था