उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaj nazron se ajab lutf ka manzar guzra

आज नज़रों से 'अजब लुत्फ़ का मंज़र गुज़रा

آج نظروں سے عجب لطف کا منظر گزرا

शायर: P P Srivastava Rind7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आज नज़रों से 'अजब लुत्फ़ का मंज़र गुज़रा
कोई शीशा नहीं खिड़की में तो पत्थर गुज़रा

सर्द अलसाई हुई रात में चुपके चुपके
आज ये कौन मिरी रूह को छू कर गुज़रा

फूल ही फूल थे बिखरे हुए ता-हद्द-ए-नज़र
मैं तिरी याद में जिस राह से हो कर गुज़रा

अब्र के टुकड़े थिरकते हैं फ़ज़ा में हर-सू
ज़ुल्फ़ बिखराता हुआ कौन खुले सर गुज़रा

दर्द का दीप जलाते हुए ख़ामोशी से
मेरा ही साया मिरे पास से हो कर गुज़रा

नफ़्सी-नफ़्सी का ये 'आलम है कि मेरा ही वुजूद
मेरे हालात से ख़ुद आँख बचा कर गुज़रा

क्या कहें 'रिंद' कि इस दौर-ए-ज़िया-परवर में
कितनी तारीक ख़लाओं ने मुक़द्दर गुज़रा