उर्दू शायरी · ग़ज़ल

daraaz-qamti tera hunar gaya aaKHir

दराज़-कामती तेरा हुनर गया आख़िर

دراز قامتی تیرا ہنر گیا آخر

शायर: P P Srivastava Rind7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दराज़-कामती तेरा हुनर गया आख़िर
जो क़द को मैं ने बढ़ाया तो सर गया आख़िर

वो जंग जीत के लौटा तो लोग पूछते थे
लहू उछालने वाला किधर गया आख़िर

करेगा कौन त'आक़ुब उदास लम्हों का
कि जो 'अलील था मुझ में वो मर गया आख़िर

जो एक लफ़्ज़ तड़पता था मेरे होंटों पर
वो कर्ब बन के लहू में उतर गया आख़िर

तिलिस्म तोड़ के एहसास-ओ-फ़िक्र-ओ-ख़्वाहिश का
ये कौन रूह को बेदार कर गया आख़िर

मुझे जुनून था तारों को तोड़ लाने का
मगर मैं ख़ुद ही ख़ला में बिखर गया आख़िर

तमाम 'उम्र के दुख-सुख को बाँट कर ऐ 'रिंद'
मिरा ग़नीम मिरे साथ मर गया आख़िर