उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankhon mein sare karb ke manzar sameT lae

आँखों में सारे कर्ब के मंज़र समेट लाए

آنکھوں میں سارے کرب کے منظر سمیٹ لائے

शायर: P P Srivastava Rind6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँखों में सारे कर्ब के मंज़र समेट लाए
दुनिया का ज़हर अपने ही अंदर समेट लाए

घर में उतरती शाम से घबरा गए थे हम
छत पर चढ़े तो धूप के कुछ पर समेट लाए

सूरज था तेज़-गाम तो हम ने भी ये किया
परछाइयों को क़द के बराबर समेट लाए

यलग़ार बढ़ रही थी सवेरे की इस लिए
सालार-ए-वक़्त रात के लश्कर समेट लाए

तर्क-ए-त'अल्लुक़ात की बे-हुरमती न हो
रिश्तों को अपने सोच-समझ कर समेट लाए

मायूसियों को इक नई हिजरत के वास्ते
हम क़ाफ़िले की आँख बचा कर समेट लाए