उर्दू शायरी · ग़ज़ल

andhere DhunDne nikle khanDar kyun

अंधेरे ढूँडने निकले खंडर क्यूँ

اندھیرے ڈھونڈنے نکلے کھنڈر کیوں

शायर: P P Srivastava Rind8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अंधेरे ढूँडने निकले खंडर क्यूँ
ख़ुदा जाने हुए ये दर-ब-दर क्यूँ

ये बू उजड़े हुए बाज़ार की है
मिरी बस्ती हुई ना-मो'तबर क्यूँ

समा'अत मुंजमिद सी हो रही है
मगर शो'ला-बयानी पर असर क्यूँ

अगर एहसास ही हैरत-ज़दा है
तो काँधे पर लिए फिरते हो सर क्यूँ

ये बोझल शाम का धुँदला तसव्वुर
मिरे एहसास पर छाया मगर क्यूँ

मिज़ाज-ए-शहर में तब्दीलियाँ हैं
मिरे तेवर बदलते देख कर क्यूँ

जहाँ पत्थर तराशे जा रहे हों
वहाँ ख़ेमा लगाएँ शीशागर क्यूँ

ख़ला से देखना है 'रिंद' दुनिया
तो फिर ठहरूँ पुराने चाँद पर क्यूँ