उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hazar aarzu ho tum yaqin ho tum guman ho tum

हज़ार आरज़ू हो तुम यक़ीं हो तुम गुमाँ हो तुम

ہزار آرزو ہو تم یقیں ہو تم گماں ہو تم

शायर: Ijtiba Rizvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हज़ार आरज़ू हो तुम यक़ीं हो तुम गुमाँ हो तुम
क़फ़स-नसीब रूह की उमीद-ए-आशियाँ हो तुम

दिलों को आ के देख लो यक़ीं नहीं गुमाँ हो तुम
लब-ए-फ़साना-साज़ पर बराए-दास्ताँ हो तुम

ग़ुबार बन के आरज़ू रवाँ-दवाँ है कू-बकू
कहीं से कुछ सदा तो दो कहाँ हो तुम कहाँ हो तुम

रह-ए-दराज़-ए-ज़िंदगी में रहरवों की ख़ैर हो
कि नाक़ा बद-क़दम है और शरीर सारबाँ हो तुम

जबीं ने खींच तो लिया तुम्हें ज़मीर-ए-संग से
हुजूम-ए-सज्दा की क़सम मगर अभी निहाँ हो तुम

ज़बाँ गुल-ओ-गियाह की है शिकवा-संज-ए-बे-दिली
यही तुम्हारा बाग़ है इसी के बाग़बाँ हो तुम

ब-हर-फ़ुसूँ तुम्हें बस इक मज़ाक़-ए-दास्ताँ-गिरी
कहीं दिल-ए-जरस हो तुम कहीं लब-ए-अज़ाँ हो तुम

न ख़त्त-ए-जादा-ए-क़दम न शम्अ-ए-मंज़िल-ए-नज़र
अभी तो कारवाँ को एक हू-ए-कारवाँ हो तुम