उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa thi aur girah-dar-girah KHayal uske

हवा थी और गिरह-दर-गिरह ख़याल उस के

ہوا تھی اور گرہ در گرہ خیال اس کے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा थी और गिरह-दर-गिरह ख़याल उस के
बिखर रहे थे कहीं नर्म-ओ-ख़ुश्क बाल उस के

मैं उस को देख तो सकता नहीं मगर दिन रात
मिरे लहू में लरज़ते हैं ख़द्द-ओ-ख़ाल उस के

दिलों का रब्त मुलाक़ात पर नहीं मौक़ूफ़
कि मेरी ज़ात से रिश्ते हैं ला-ज़वाल उस के

दिया फ़रेब तो बदले में ले लिया सब कुछ
कभी सुनो तो करिश्मे हैं बे-मिसाल उस के

मैं उस से बच के निकलना तो चाहता था मगर
रविश रविश यहाँ फैले हुए थे जाल उस के

अगर वही है तो बतलाओ किस तरह आख़िर
मिरे बग़ैर गुज़रते हैं माह-ओ-साल उस के

मिले तो चूम लूँ उस की उदासियाँ कि 'ज़फ़र'
'अज़ीज़-तर मुझे उस से भी हैं मलाल उस के