उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa badal gai us bewafa ke hone se

हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से

ہوا بدل گئی اس بے وفا کے ہونے سے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा बदल गई उस बेवफ़ा के होने से
वगरना ख़ल्क़ तो ख़ुश थी ख़ुदा के होने से

ख़बर नहीं मुझे मतलूब और क्या है कि मैं
ज़ियादा ख़ुश नहीं अर्ज़ ओ समा के होने से

हमेशा बर-सर-ए-पैकार हूँ कहीं न कहीं
मुझे 'इलाक़ा नहीं बच-बचा के होने से

ये शो'ला दिल से अलग हो के भी निकल आया
कुछ आग फैल गई है हवा के होने से

ये शहर कुछ भी मज़ाफ़ात के बग़ैर नहीं
वजूद अस्ल में है मावरा के होने से

जुदाई छोड़ती रहती है वस्ल की ख़ुशबू
मैं ज़िंदा रहता हूँ अक्सर क़ज़ा के होने से

मैं पुर्ज़ा पुर्ज़ा पड़ा हूँ जहाँ-तहाँ हर सम्त
ख़फ़ा सभी हैं मिरे जा-ब-जा के होने से

ज़रूरतें ही मिरी हो नहीं रहीं पूरी
रुका है क़ाफ़िला इक बे-नवा के होने से

जो रह गई है ये एक आँच की कसर तो 'ज़फ़र'
वो ज़र-गरी थी किसी कीमिया के होने से